गुरुवार, 7 जनवरी 2016

क्रमशः आगे : सामाजिक संस्थान

क्रमशः आगे : सामाजिक संस्थान
राधे श्याम थवाईत
Social institutions are established or standardized patterns of rule-governed behavior. They include the family, education, religion, and economic and political institutions.

क्रमशः --- (फीडबैक के बाद)
सामाजिक संस्थान को समझने के लिए कुछ संस्थानों का वर्णन नीचे दिया जा रहा है-
परिवार प्रत्यक्ष नातेदारी संबंधों से जुड़े व्यक्तियों का एक समूह है जिसके बड़े सदस्य बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व लेते हैं.
परिवार को एक प्राकृतिक (नैसर्गिक) सामाजिक संस्थान माना गया है, क्योंकि यह सभी समाजों में प्रारम्भ में ही विद्यमान रहा है. किसी समाज का स्वरूप चाहे कैसा भी रहा हो उनमें परिवार-विवाह-नातेदारी सदैव से रहा है.  परिवार को एक सामाजिक संस्थान माने जाने के निम्नांकित विशेषताओं को रेखांकित किया जा सकता है-
1.      एक संस्था का अन्य संस्थाओं से सम्बन्ध होना. परिवार जो कि एक निजी क्षेत्र है आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक आदि सार्वजनिक संस्थाओं से सम्बन्ध रहा है.
2.      संस्थानों की तरह परिवार का भी एक कार्य व दायित्व होता है.
3.      किसी संस्थान (परिवार) का कार्य समाज की व्यवस्थाओं को बनाए रखने में मदद करता है. जैसे- परिवार में यदि महिलाएं घर का काम और पुरुष बाहर का कार्य करते हैं तो यह औद्योगिक समाज को बनाए रखने में मदद करता है.[1]-[2]
4.      संस्थाओं के स्वरूपों में परिवर्तन होना. जैसे संयुक्त परिवार से एकल परिवार वाले समाज में परिवर्तन. कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था तथा औद्योगिक अर्थ व्यवस्था वाले शहरीकरण वाले समाज में क्रमशः संयुक्त एवं एकल परिवार का होना.
5.      संस्थान के पास शक्ति या सत्ता का होना. जैसे परिवार के मुखिया के द्वारा अपनी शक्ति या सत्ता का उपयोग करते हुए अन्य सदस्यों को कार्य सौंपना.
विवाह को एक सामाजिक संस्थान माने जाने के निम्नांकित विशेषताओं को चिह्नित किया जा सकता है-
विवाह दो वयस्क (पुरुष-स्त्री) व्यक्तियों के बीच लैंगिक संबंधों की सामाजिक स्वीकृति है.
1.      संस्थान की ही तरह विवाह के भी अनेक स्वरूप होते हैं. जैसे- एकल विवाह, बहुविवाह.
2.      विवाह को भी किसी संस्थान की तरह नियंत्रित करने के कुछ नियम होते हैं. जैसे- एकल विवाह में कोई पुरुष किसी समय में एक ही स्त्री से और कोई स्त्री एक ही पुरुष से विवाह कर सकते हैं.
3.      दूसरे विवाह की अनुमति तभी होगी जब पहले विवाह साथी से तलाक हो गया हो या मृत्यु.
4.      कुछ समाजों में / परिवारों में यह भी प्रथाएं होती है कि कौन किससे विवाह कर सकता है और किससे नहीं. जैसे एक ही गोत्र में विवाह करने की अनुमति का न होना.
(ग)  राजनीति एक सामाजिक संस्थान -
इसे सामाजिक संस्था के रूप में समझने में मुख्य रूप से दो शब्दों (संकल्पनाओं) पर ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है एक – शक्ति और दूसरा – सत्ता. इसे निम्नांकित दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है-
1.      शक्ति या सत्ता व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के पास होता है जिसका उपयोग उन व्यक्ति या समूह के लिए होता है जिसके पास ये शक्ति / सत्ता नहीं होती.
2.      राजनैतिक दलों के पास अपने कार्यक्रमों को पूरे देश में लागू करने की शक्ति होती है. इसी तरह दल के अध्यक्ष के पास किसी सदस्य को दल से पृथक करने की शक्ति होती है.
3.      उपरोक्त तरह के सभी शक्तियों का उपयोग सत्ता के माध्यम से किया जाता है.
4.      संस्थान का एक उद्देश्य होता है. राजनैतिक दल अपने उद्देश्यों को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से करता है.
5.      संस्थान की एक वैधता होती है. राजनीति में शक्ति का उपयोग सत्ता के माध्यम से करने से उसमें एक प्रकार की वैधता आ जाती है जिसे समाज में न्याय संगत माना जाता है. जिससे शक्ति को संस्थागत स्वरूप मिल जाता है.
6.      संस्थान की एक निश्चित संरचना तथा कार्य विधियाँ होती है. इस मायने में ‘राज्य’[3] की एक संरचना व कार्यविधियों को आसानी से चिह्नित किया जा सकता है.
7.      उपरोक्त कार्यविधियों व संरचना पर उस समूह की आस्था होती है जिससे समूह संचालित होता है क्योंकि यह एक वैध व्यवस्था होती है. 
धर्म को सामाजिक संस्थान के रूप में समझने के लिए कुछ तथ्यों को निम्नांकित रूपों में व्यवस्थित किया जा सकता है-
1.      धर्म विश्व के सभी समाजों में विद्यमान है. यद्यपि विभिन्न समाजों में इसका स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है.
2.      किसी संस्थान की तरह विश्व की सभी धर्मों की कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं-
·         प्रतीक / प्रतीकों का समुच्चय
·         सम्मान / श्रद्धा
·         अनुष्ठान-समारोह
·         विश्वासकर्ताओं का समूह
3.      सभी धर्मों की एक रीति-रिवाज / प्रथाएं होती हैं.
4.      धर्म का अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ सम्बन्ध होता है. धर्म का राजनीति से सम्बन्ध का एक उदाहरण यह है कि इतिहास में समय-समय पर सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन के लिए धार्मिक आन्दोलन हुए हैं.
5.      धर्म के साथ व्यक्ति / व्यक्तियों के समूह का एक आस्था होता है.
6.      किसी राज्य का धर्म / पंथ निरपेक्ष का होना या न होना भी राजनीति व धर्म के संबंधों को दर्शाता है.
7.      मैक्स वेबर के अनुसार कैल्विनवाद  जो कि प्रोटेस्टेंट इसाई धर्म की एक शाखा है, ने पूंजीवाद के उद्भव व विकास को प्रभावित करता है. कैल्विनवाद के सिद्धांत में मितव्ययता से रहना शामिल है. जिसमे निवेश को पवित्र सिद्धांत माना गया है जो पूंजी उत्पन्न कर आर्थिक विकास पर प्रभाव डालता है.
शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली एक प्रक्रिया है जिसमे औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों ही शिक्षा आती है. यहाँ सामाजिक संस्थान के रूप में शिक्षा को समझने के लिए औपचारिक शिक्षा को आधार बनाया गया है-
1.      शिक्षा एक तरह से सामाजिक दक्षताएं प्राप्त करने का साधन है. जिसके कारण व्यक्ति को / समाज को इसकी आवश्यकता होती है जो प्रायः विश्व के सभी समाजों के लिए सत्य है.
2.      व्यक्ति का समाजीकरण शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है.
3.      सभी तरह के समाजों में एक मूल्य होता है.
4.      शिक्षा की रचना एकरूपता, मानकीकृत व सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए होती है. जैसे – विद्यालय में बच्चों की एक जैसी वर्दी का होना.
5.      शिक्षा समाज में विशिष्ट व्यवसाय के लिए तैयार करती है एवं समाज के मूल्यों को आत्मसात करने के लिए तैयार करती है जो सामाजिक मानकों एवं आवश्यकताओं पर निर्भर होती है[4].
6.      प्रकार्यवादियों के अनुसार शिक्षा सामाजिक संरचना को बनाए रखने तथा नवीनीकरण करने में मदद करती है.
7.      शिक्षा समाज में स्तरीकरण के मुख्य अभिकर्ता के रूप में कार्य करती है. इसका असमान वितरण इसी स्तरीकरण का परिणाम है.
8.      एक अच्छी शिक्षा के अवसर अनेक सामाजिक कारकों का परिणाम होता है.




उपरोक्त सामाजिक संस्थाओं की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर किसी सामाजिक संस्थान की विशेषताओं को निम्नांकित तरह से सूचीबद्ध किया जा सकता है-
1.      संस्थान के उद्देश्य, कार्य व दायित्व होते है.
2.      विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के मध्य आपसी सम्बन्ध होता है
3.      संस्था का मानक-आस्था-मूल्य होता है 
4.      सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में मददगार होता है.
5.      संस्था का स्वरूप परिवर्तनशील होता है.
6.      संस्था के पास एक शक्ति / सता विद्यमान होता है. नियंत्रण करने की शक्ति होती है.
7.      नियमों / प्रथाएं होती है. इसे समाज में वैधता व स्वीकार्यता होती है, विश्वास होता है.
8.      संस्था के प्रति समाज का सम्मान होता है.
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[1] प्रकार्यवादियों के अनुसार (Giddens 2001)
[2] यद्यपि यह पुरी तरह सत्य नहीं है. अध्ययन यह बताते हैं कि वस्त्र निर्यात जैसे समकालीन उद्योग में महिला श्रमिक बल काफी रहा है.
[3] प्रकार्यवादी दृष्टिकोण ‘राज्य’ को समाज के प्रतिनिधि के रूप में देखती है. संघर्षवादी दृष्टिकोण राज्य को प्रभावशाली अनुभागों के रूप में देखता है.
[4] एमिल दुर्खाइम, प्रकार्यवादी दृष्टिकोण.

शनिवार, 23 मई 2015

सामाजिक संस्थान
व्यक्ति अपने जीवन में अनेक निर्णय लेता है. व्यक्ति द्वारा लिया गए निर्णय पहली नज़र में ऐसा लगता है कि वह निर्णय स्वयं ले रहा है. लेकिन गहराई में चिंतन करने या समाजशास्त्रीय दृष्टि से चिंतन करने पर यह सच्चाई सामने आती है कि इस निर्णय के पीछे किसी न किसी सामाजिक संस्थान के विचार होते हैं या यह कह सकते हैं कि उस व्यक्ति द्वारा लिए गए निर्णय के पीछे किसी सामाजिक संस्थान का हाथ होता है. अर्थात ये सामाजिक संस्थाएं व्यक्ति / व्यक्तियों के समूह को, उसके व्यवहार को, क्रियाकलापों को नियंत्रित / प्रतिबंधित या कभी-कभी दण्डित करने का कार्य करती है.
ये सामाजिक संस्थाएं राज्य की तरह बृहत तथा परिवार के रूप में छोटी हो सकती है. परिवार नामक सामाजिक संस्थान में विवाह एवं नातेदारी पर विचार होता है या ये कह सकते हैं कि ये उसके मुख्य तत्व होते हैं. इसी तरह राजनीति, अर्थ व्यवस्था, धर्म, शिक्षा आदि भी एक सामाजिक संस्थान के रूप में कार्य करती है.
किसी संस्था की सामान्य लक्षणों की बात करें तो ये कहा जा सकता है कि ये स्थापित होते हैं (या स्थापित हो जाते हैं), इसके लिए कोई कानून / प्रथाएं होती हैं जिसके अनुसार यह संस्था कार्य करती है, ये व्यक्तियों पर, उसके क्रियाकलापों पर प्रतिबन्ध लगाती है, साथ ही साथ ये व्यक्तियों को अवसर भी प्रदान करती है. इस सबके अलावा सभी तरह के संस्थान (धर्म, परिवार, राज्य, शिक्षा........) का एक लक्ष्य भी होता है.
समाजशास्त्र के अर्थ / मायने के मामले में जिस तरह के अलग-अलग विद्वानों की अलग-अलग विचारधाराएं प्रचलित हैं उसी तरह सामाजिक संस्थान के बारे में भी अलग-अलग दृष्टिकोण हैं. प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के अनुसार किसी भी सामाजिक संस्थानों में सामाजिक मानक-आस्था एवं मूल्य ये तीन तत्व जरूर होते हैं. इनके अनुसार ये संस्थाएं तो तरह की हो सकती है; पहला औपचारिक संस्था जैसे क़ानून शिक्षा आदि तथा दूसरा अनौपचारिक संस्थान जैसे परिवार, धर्म आदि.
संधर्षवादी दृष्टिकोण में मान्यता है कि किसी भी समाज में व्यक्तियों का स्थान समान नहीं होता. इन संस्थानों का संचालन कुछ प्रभावशाली वर्ग के द्वारा उनके हित में हो रहा होता है और वे इस प्रयास में रहते हैं कि उनके विचार ही पूरे समाज के विचार बन जाएं. ये प्रभावशाली वर्ग ही आगे चलकर शासक की भूमिका में होते हैं और शेष शासित.
परिवार, विवाह एवं नातेदारी के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि ये नैसर्गिक सामाजिक संस्थान है जो विश्व के सभी समाजों में होते हैं अतः इसे महत्वपूर्ण घटक माना जा सकता है.
प्रकार्यवादी यह मानते हैं कि जिस समाज में पुरुष वर्ग जीविकोपार्जन में और महिला वर्ग परिवार की देखभाल में लगी होती हैं वह समाज औद्योगिक समाज को सहज बना देती है, ऐसा समाज अच्छा कार्य कर रहा होता है. इस तरह घर का एक सदस्य घर के बाहर के कार्यों में और दूसरा घर और बच्चों की देखभाल में लगा होता है. हालांकि इस तरह की व्यवस्था में लिंग भेद के प्रश्न प्रमुखता में उठाये जाते हैं. क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से यह देखा गया है कि कपड़ा कारखानों में महिला श्रम बल की भी प्रधानता रही है. इसी तरह आंध्रप्रदेश में दूरस्थ अंचल में रहने वाली ‘काडर’ नामक जनजाति में अभी भी सभी कार्य महिला एवं पुरुष एक साथ करते हैं, उनके मनोरंजन के साधन भी एक जैसे है.
समाज में कभी-कभी परिस्थितिवश घर महिला प्रधान भी हो जाते है. जैसे किसी घर का मुखिया नगर प्रवास कर जाता है तो वहां की महिला को खेतों में काम करने के साथ घर के सदस्यों का भरण – पोषण की जिम्मेदारी उस पर आ जाती है. दक्षिण-पूर्व महाराष्ट्र और उत्तरी आँध्रप्रदेश में कोलम जनजाति समुदाय में भी महिला प्रधान घर होते हैं.
अध्ययनों से पता चलता है कि आवास के नियमों के अनुसार मातस्थानिक या पितृस्थानिक समाज पाए जाते हैं. मातस्थानिक में पुरुष अपनी पत्नी के अभिभावक के घर में और पितृस्थानिक समाज में पुरुष अपनी पत्नी के साथ अपने अभिभावक के यहाँ रहता है.............क्रमशः आगे ........
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गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

मध्यान्ह भोजन : स्वतन्त्रता एवं समानता
सरकार से मान्यता प्राप्त एवं अनुदान प्राप्त स्कूल जहां सरकारी मान के अनुसार बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन की समुचित व्यवस्था है, जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. स्कूलों में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था सिर्फ बच्चों के लिए पौष्टिक आहार की पूर्ति मात्र नहीं है, बल्कि बच्चों तक संवैधानिक मूल्यों के सामाजिक सन्देश को पहुंचाने का माध्यम भी है. सभी बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करें इससे अच्छा समानता के उदाहरण हमें कहीं मिलेगा नहीं. लेकिन इसे शालाओं के माध्यम से बच्चों के मन में बिठाने में शिक्षको-अधिकारियों को सतर्क रहने की जरुरत है. यहाँ हमें यह विचार करने की जरुरत है की कहीं समानता स्थापित करने के लिए उनकी स्वतंत्रता को चोट तो नहीं पहुंचा रहे हैं? दरअसल यहाँ हम जिस स्कूल का जिक्र करने जा रहे है उस स्कूल में मध्यान्ह भोजन के समय शाला के मुख्य दरवाजे पर ताला जड़ दिया जाता है. ऐसा करने के पीछे शाला प्रबंधन का तर्क होता है कि बच्चे इस समय शाला परिसर से बाहर जाते हैं तो दुर्घटना होने की आशंका होती है. इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरी हो.
       ऊपर जो कुछ लिखा गया है उसमे कुछ भी गलत नहीं लगता लेकिन गौर करने से इसे हम मध्यान्ह भोजन व्यवस्था का एक पक्ष ही कह सकते हैं. दरअसल मध्यान्ह भोजन के समय शाला के मुख्य दरवाजे पर ताला जड़ना, कुछ बच्चों की पढाई को बाधित भी करता है. क्योंकि प्रत्येक शाला में कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिन तक हम समानता के सामाजिक सन्देश को पहुंचाए बिना उनसे उम्मीद करते हैं कि वे सभी बच्चों के साथ बैठकर भोजन करें, इनमे से भी वे बच्चे जिनका घर शाला के पास होता है वे मध्यान्ह भोजन के लिए अपने घर जाना चाहते हैं. शाला के मुख्य दरवाजे पर ताला लग जाने से ऐसे बच्चों को मध्यान्ह के बाद  शाला में भूखे ही रहना पड़ता है. इन भूखे बच्चों के बारे में कक्षा की एक शिक्षिका का अवलोकन है कि ये बच्चे मध्यान्ह के बाद अपना मन पढ़ाई में लगा नहीं पाते और ये सब इसलिए की इन बच्चों को सुरक्षा के नाम पर मध्यान्ह के समय शाला में जबरदस्ती रोक कर रखा जाता है. ये बच्चे शायद ज्यादा दिनों तक भूखे रह नहीं पायेंगे और शायद मज़बूरी में अन्य बच्चों के साथ बैठकर खाना भी शुरू कर दें और हम इस मुगालते में रहें कि इस स्कूल में सभी बच्चे एक साथ बैठ कर खाना खाते हैं.
जेंडरीकरण के साक्ष्य और बदलाव :
हम सभी व्यस्क विशेषकर जो शिक्षा में काम करते हैं हम अपने आसपास जेंडरीकरण के साक्ष्य ढूंढ़ते रहते हैं, जैसे- लड़कों का शाम को / रात को देर तक बाहर रहने में (लेकिन महिलाओं / लड़कियों से अपेक्षा करना की जल्दी घर आ जाएं), बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में, शाला की गतिविधियों में, कक्षा के अन्दर बच्चों की बैठक व्यवस्था में ख़ास कर जब हम कक्षा में एक  तरफ बैठे छात्राओं और दुसरे तरफ बैठे छात्रों को देखते हैं तो हम सीधे तौर पर सामाजिक तानाबाना पर उंगली उठाते हैं कि देखो कैसे सामाजिक व्यवस्था है जो बच्चों को ना तो एक साथ बैठने की इजाजत देता है ना ही साथ खेलने में. इन सभी अवलोकनों में हम ये भूल जाते हैं कि हम सभी व्यस्क भी ऐसा ही करते हैं, हम स्वयं  जब बड़े-बड़े आयोजनों में भाग लेते हैं तो हमारी भी बैठक व्यवस्था में जेंडरीकरण साफ़ दीखता है जहां महिलाएं एक साथ बैठे मिल जायेंगे, इसी तरह पुरुषों को भी महिलाओं के समूह में बैठने में दिक्कत महसूस करते - संकोच करते आसानी से देखा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है. इसे जेंडरीकरण के साथ - साथ क्षेत्रीयता के सन्दर्भ में भी देखा जाना चाहिए.

       हालांकि इस देश में औपचारिकेत्तर शिक्षा के आने के बाद जो बदलाव जेंडरीकरण एवं सामाजिकरण के क्षेत्र में हुए हैं उसे भूल नहीं सकते और इस बदलाव को समाज की मौन स्वीकृति भी है. यह बदलाव है छात्र-छात्राओं के लिए सरकार के द्वारा सह-शिक्षा की व्यवस्था. १९८२ से पहले तक सरकार एवं समाज ये मानकर चलती थी की बच्चों एवं बच्चियों के लिए अलग-अलग शाला की व्यवस्था हो. लेकिन आज जिस तरह शाला की व्यवस्था को बच्चों और बच्चियों के लिए सामान आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है, हमें आशान्वित होना चाहिए कि जेंडरीकरण और सामाजिकरण में बदलाव संभव है.   

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

समाज में विषमताएं - एक परिचय

डी.एड. प्रथम वर्ष


पठन सामग्री- समाज में विषमताएं एक परिचय


कॉन्सेप्ट मेपिंग






1. सैद्धांतिक रूप से इंसानियत का आधार समानता है.


2. अमीरी व गरीबी- आर्थिक, आय, संपत्ति में असमानता है.


3. किसी की क्षमता में असमानता का एक कारण अवसर की असमानता भी हो सकती है.


4. राजनैतिक, प्रशासनिक तथा न्यायालयीन सन्दर्भों के अलावा समाज में सत्ता का असमान वितरण के रूप में भी भी असमानता है.


5. संपत्ति, शिक्षा, क्षेत्रीयता, लिंग, जाति आदि समाज में किसी की प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है. ये प्रतिष्ठा अवसर, क्षमता व सता पर भी प्रभाव डालता है.


6. असमानता न केवल लोगों के अवसरों तथा प्रतिष्ठा को प्रभावित करता है बल्कि शोषक एवं शोषित होने का रिश्ता भी बनाता है.


7. जाति, परिवार, शिक्षा, बाज़ार, इन सभी क्षेत्रों में कुछ वर्जनाएं हैं जो लोगों को सामान्य अवसरों से वंचित रखता है.



पाठ में निहित उद्देश्य-


उपरोक्त अवधारणाओं के लिए हमें समझना होगा कि-



  • समाज में किस-किस प्रकार की विषमताएं मौजूद हैं?

  • असमानताएं/विषमताएं मनुष्य की प्रतिष्ठा, स्वतन्त्रता, शारीरिक क्षमता, अवसर को कैसे प्रभावित करती है?

  • किसी सार्वभौमिक सिद्धांत के हवाले से समाज में वर्जनाएं कैसे निर्मित होती है.

कक्षा शिक्षण की प्रक्रिया-



  • पठन सामग्री को पढ़ कर समाज में व्याप्त विभिन्न असमानताओं को छातराध्यापक उदाहरण सहित चिन्हित करेंगे.


  • इन असमानताओं का प्रभाव किन-किन क्षेत्रों में पडता है? अपना विचार उदाहरण सहित कक्षा में रखेंगे.

  • प्रत्येक छात्राध्यापक ‘असमानता एवं विकास’ पर एक नोट १०० शब्दों में लिखेंगे.

मूल्यांकन प्रक्रिया-


‘असमानता एवं विकास’ पर छात्राध्यापकों द्वारा तैयार नोट का परीक्षण निम्नांकित बिंदुओं के आधार पर किया जा सकता है-



  • क्या वे समाज में मौजूद असमानताओं को उदाहरण सहित चिन्हित कर पाते हैं?

  • क्या वे असमानताओं का प्रभाव समाज में, व्यक्ति के विकास में देख पाते हैं.?

  • क्या वे शुद्धता का सिद्धांत, पारिवारिक मूल्यों का सिद्धांत, योग्यता का सिद्धांत से सम्बंधित उदाहरण दे पाते हैं? आदि.

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जाति व्यवस्था का शिक्षा व शिक्षण पर प्रभाव

डी.एड. प्रथम वर्ष


पठन सामग्री क्र.- ४


जाति व्यवस्था का शिक्षा व शिक्षण पर प्रभाव


कॉन्सेप्ट मेपिंग






1. जाति व्यवस्था की धारणा- व्यक्ति को क्या काम करना है? किस तरह का जीवन जीना है? जन्म से ही तय होता है.


2. लोगों की सामाजिक एवं आर्थिक हैसियत को बदलने में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है.


3. शालाओं में कुछ खास वर्ण के लोगों की भाषा, संस्कृति और तौर तरीकों का प्रभाव अधिक होता है. इससे कुछ तबकों के बच्चों को मुश्किलें उठानी पडती है.


4. दलितों व आदिवासियों को शिक्षित होने के लिए कई तरह के पूर्वाग्रहों व बाधाओं का सामना करना पडता है.


5. शिक्षकों की सामाजिक पृष्ठभूमि, शालाओं में उनके व्यवहार को काफी हद तक नियंत्रित करती है.


6. सामाजिक चतुराई, शालीन भाषा, शिष्टाचार और फैशन सांस्कृतिक पूंजी के अंग हैं. जो प्रभुत्वशाली वर्ग के बच्चों कों शैक्षणिक संस्थानों में विशेष दर्जा दिलाती है.


7. समुदाय के अनुरूप शालाओं का शैक्षिक कैलेण्डर स्कूलों में बच्चों की भागीदारी बढ़ा सकती है.


8. शाला में लोकतांत्रिक मूल्यों को विकसित कर समाज के जातीय ढांचें में परिवर्तन की जा सकती है.





पाठ में निहित उद्देश्य-


उपरोक्त अवधारणाओं को समझने के लिए हमें जानना होगा कि-


· जाति व्यवस्था क्या है, इसमे कौन-कौन सी धारणा निहित है?


· शालाओं में पदस्थ शिक्षकों की सामाजिक पृष्ठभूमि उनके व्यवहार को कैसे नियंत्रित करती है?


· बच्चों के शाला छोडने में जाति व्यवस्था की क्या भूमिका होती है?


· दलितों व आदिवासियों की शिक्षा में कौन-कौन से पूर्वाग्रह एवं बाधाएं हैं?


कक्षा शिक्षण की प्रक्रिया-


कक्षा में निम्नांकित प्रश्नों के आधार पर छात्राध्यापकों के मध्य खुली चर्चा कराना-


· जाति व्यवस्था से आप क्या समझतें है?


· जाति व्यवस्था के प्रति आपकी क्या धारणा है?


· शाला के शिक्षकों के व्यवहार में जातीय व्यवस्था की क्या भूमिका है?


· समाज में व्याप्त असमानताओं को समाप्त करने में शालाओं एवं शिक्षकों की क्या भूमिका हो सकती है?


· लोकतांत्रिक मूल्य क्या हैं? इसे विकसित करने में शालाओं की क्या भूमिका हो सकती हैं?


उपरोक्त बिंदुओं में जब कोई छात्राध्यापक अपना विचार व्यक्त करे तो अन्य छात्राध्यापकों की इस पर सहमती और असहमती जानें, उन्हें बोलने के लिए प्रेरित करें. उन्हें अपनी बात रखने के लिए शाला शिक्षण अनुभव से उदाहरण देने के लिए कहें, शिक्षण अनुभव से जोडने के लिए कहें.





मूल्यांकन प्रक्रिया-


1. छात्राध्यापकों के पास कुल १२५ दिवसों (प्रथम एवं द्वितीय वर्ष) का शिक्षण अनुभव है. इस आधार पर छात्राध्यापक एक निबंध लिखें जिसमें जाति व्यवस्था का बच्चों की शिक्षा पर पडने वाले प्रभाव, बच्चों के शाला छोडने के कारणों का जिक्र हो.


2. शिक्षकों की सामाजिक पृष्ठभूमि का और उनकी शाला में बच्चों के साथ व्यवहार के मध्य संबंधों को चिन्हित कर टीप लिखवाना.


3. यदि किसी छात्राध्यापक ने बच्चों / शिक्षकों के सामाजिक पृष्ठभूमि पर परियोजना कार्य किया हो तो उसे भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाएँ.


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